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खेत-खलिहान
जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा करेगी हिमाचल सरकार की यह योजना

जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए राज्य सरकार ने ‘मुख्यमंत्री खेत संरक्षण योजना’ आरम्भ की है, जिसके तहत किसानों की फसलों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए सौर बाड़ लगाने पर किसानों के समूह को 80 प्रतिशत का उपदान प्रदान किया जा रहा है। इस योजना के लिए 35 करोड रुपये का प्रावधान किया गया है।

हिमाचल में होगा प्राकृतिक खेती का विस्तार

हिमाचल में जीरो बजट प्राकृतिक खेती को विस्तार देने के लिए हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय ने 420 लाख रुपए की शोध परियोजना ‘हिमाचल प्रदेश में शून्य लागत प्राकृतिक खेती की तकनीकों का मूल्यांकन, परिशोध व प्रसार’ सरकार को प्रेषित की है।

कृषि-बागबानी के लिए संजीवनी साबित होगी यह बर्फबारी

हिमाचल में हुई बारिश गेहूं की फसल सहित सब्जियों के लिए लाभदायक है। बर्फबारी से सेब की बंपर फसल की उम्मीद है। जमीन को पर्याप्त मात्रा में नमी मिलने से गेहूं का बीमारियों से बचाव होगा। मटर, साग, मूली, शलगम आदि की सब्जियों के लिए भी यह बारिश लाभदायक है। साथ ही, आजकल लगाई जाने वाली प्याज की पनीरी के लिए जमीन को पर्याप्त नमी इस बारिश से मिल गई है। इससे पनीरी तैयार करने में परेशानी नहीं आएगी।

गेहूं, जौ और लहसुन का जल्द करवाएं बीमा

कृषि विभाग ने रबी सीजन की फसलों के बीमे के लिए अधिसूचना जारी कर दी है। कुल्लू जिला में भी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना एवं पुनर्गठित मौसम पर आधारित फसल बीमा योजना के तहत किसान गेहूं, जौ और लहसुन का बीमा करवा सकते हैं।

औषधीय पौधे बढ़ायेंगे हिमाचल की आर्थिकी

समशीतोषण क्षेत्र के महत्वपूर्ण औषधीय पोधों का कृषिकरण : ग्रामीण आय की वृद्धि एवं विविधिकरण के लिए

जानिए कृषि और बागवानी के लिए क्या है हिमाचल सरकार की योजनाएं

मण्डी मध्यस्थता योजना के तहत 21196 मी.टन फल की खरीद

फसलों में रोग की प्रतिछाया के मंथन को इस दिन नौणी विवि में जुटेगें देश भर से वैज्ञानिक

डॉ यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी और वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के पादप रोग विज्ञान विभाग (प्लांट पैथोलॉजी) द्वारा नवम्बर 2 और 3 को विश्वविद्यालय परिसर में किसानों की आय बढ़ाने के लिए संयंत्र स्वास्थ्य प्रबंधन में वैकल्पिक दृष्टिकोण विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है।

यहां जीरो बजट में पारंपरिक तरीके से होती है लाल चावल की खेती

हिमाचल की दुर्गम चौहार घाटी मे आज भी प्राकृतिक रूप से परंपरागत तरीके से लाल चावल उगाया जाता है। आज के युग में केमीकल खेती ने जहां खाद्य पदार्थों की गुणवता पर सवालिया चिन्ह लगा दिए हैं वहीं प्रदेश में आज भी कुछ दुर्गम क्षेत्रों में परंपरागत खाद्यों पदार्थों की खेती की जा रही है। इसी में शामिल है चौहार घाटी के चौहारटु चावल जो अपने लाल रंग व अपनी औषधीय गुणवत्ता के कारण विशेष महत्व रखते हैं। हरित क्रांति के दौर में अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों की ओर किसानों के रूझान से दूर चौहार घाटी के किसान आज भी लगभग एक हजार हैक्टेयर में लाल चावलों की चौहारटी किस्म उगा रहे हैं। पब्बर नदी के दोनों तटों पर उगाए जाने वाले चावलों की यह किस्म प्रदेश के अन्य चावलों से पूर्णतय भिन्न है।