हिंदी ENGLISH ਪੰਜਾਬੀ Monday, November 19, 2018
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जरा हट के
'इस प्यार को क्या नाम दूं'

दोस्ती और प्यार एक सलोना और सुहाना अहसास है, जो संसार के हर रिश्ते से अलग है। तमाम रिश्तों के जंजाल में यह मीठा रिश्ता एक ऐसा सत्य है जिसकी व्याख्या होना अभी भी बाकी है। व्याख्या का आकार बड़ा होता हो सकता है लेकिन गहराई के मामले में वह अनुभूति की बराबरी नहीं कर सकती। इसीलिए दोस्ती और प्यार की कोई एक परिभाषा आजतक नहीं बन सकी। पूरी उम्र इंसान को एक अच्छे दोस्त की तलाश रहती है। इसी तलाश में यह पता चलता है कि दोस्ती का एक रंग नहीं होता बल्कि अलग-अलग रंगों से सजी दोस्ती कदम-कदम पर अपना रूप दिखाती है।

यहां बारिश होना किसी अजूबे से कम नही

हिमाचल की लाहुल स्पीती के किब्बर की धरती पर बारिश का होना किसी अजूबे से कम नही होता। बादल यहां आते तो हैं लेकिन शायद इन्हें बरसना नहीं आता और ये अपनी झलक दिखाकर लौट जाते हैं। एक तरह से बादलों को सैलानियों का खिताब दिया जा सकता है जो घूमते, टहलते इधर घाटियों में निकल आते हैं और कुछ देर विश्राम कर पर्वतों के दूसरी ओर रुख कर लेते हैं। यही वजह है कि किब्बर में बारिश हुए महीनों बीत जाते हैं। यहां के बाशिंदे सिर्फ बर्फ से साक्षात्कार करते हैं और बर्फ भी इतनी कि कई-कई फुट मोटी तहें जम जाती हैं। जब बर्फ पड़ती है तो किब्बर अपनी ही दुनिया में कैद होकर रह जाता है और गर्मियों में धूप निकलने पर बर्फ पिघलती है तो किब्बर गांव सैलानियों की चहलकदमी का केंद्र बन जाता है।

आज भी कौतूहल का विषय है ग्यू की ममी

हिमाचल की स्पीति घाटी जहां बौद्ध मठों व रेत की दृश्यावलियों के कारण विश्व विख्यात है, वहीं यहां ऐसा बहुत कुछ है, जो हैरान करने वाला है। यहां के एक गांव में एक लामा की ममी का अस्थि पिंजर बैठी हुई मुद्रा में अभी तक सलामत है। अभी भी उसके सिर पर बाल हैं। 

शिमला के जंगल में भालू वाला पेड़

कहा जाता है कि सैंकड़ों वर्षों पूर्व ये आदमख़ोर भालू किसी व्यक्ति के पीछे दौड़ रहा था. तो उस व्यक्ति ने पथरी माता (पुराना जुन्गा में स्थित पथरी माता मंदिर) से प्राथना की,  हे माता! इस भालू से मेरे प्राणों की रक्षा कीजिये. ये कहते हुए व्यक्ति एक देवदार के वृक्ष पर चढ़ने लगा. भालू भी व्यक्ति के पीछे पेड़ पर चढ़ने लगा और जैसे ही पेड़ के मध्य में पहुँचा तो पूरा भालू लकड़ी का बन गया. (जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है) सदियों से जीवित ये पेड़ और उस पर चिपका लकड़ी का भालू आज भी सदियों पुरानी हक़ीक़त बयान करता है.