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राजनीति

कांग्रेस के 11 विधायकों ने खोला सुक्खू के खिलाफ मोर्चा, वीरभद्र के खिलाफ बयानबाजी न करने की दी नसीहत

हिमाचल न्यूज़ | January 14, 2019 08:13 PM

हिमाचल न्यूज़

शिमला : प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाए गए सुखविंद्र सिंह सुक्खू से उनकी ही पार्टी के एक दर्जन के करीब विधायक खफा हो गए हैं। कांग्रेस के 11 विधायकों ने सुक्खू पर बड़ा हमला बोला है। पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह पर सार्वजनिक तौर पर अशोभनीय बयानबाजी करने पर इन विधायकों ने सुक्खू की कड़ी ओलाचना की है और सुक्खू को सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान देने से परहेज करने की नसीहत दी है। कांग्रेस विधायकों आशा कुमारी, धनीराम शांडिल, आईडी लखनपाल, नंद लाल, जगत सिंह नेगी, राजेंद्र राणा, मोहल लाल ब्राक्टा, विक्रमादित्य सिंह, विनय कुमार, आशीष बुटेल और पवन काजल ने सोमवार को एक सांझा बयान में कहा कि सुक्खू द्वारा वीरभद्र सिंह पर की जा रही टिप्पणियां निंदनीय हैं और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद को गंवाने पर उनकी बौखलाहट और बीमार मानसिकता को उजागर करता है।

कांग्रेस विधायकों ने कहा कि वीरभद्र सिंह न केवल हिमाचल प्रदेश कांग्रेस बल्कि पूरे भारत में वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक के भारत के प्रधानमन्त्रियों के साथ देश व प्रदेश को उन्नति के पग पर ले जाने वाला कार्य किया है। इसके अतिरिक्त वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के 6 बार मुख्यमंत्री, कई बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व केन्द्रीय मन्त्री के रूप में भी देश के लोगों की सेवा कर चुके हैं। सुक्खू के हालिया बयान न केवल वीरभद्र सिंह अपितु कांग्रेस पार्टी व प्रदेश के लोगों को भी अपमानित करने वाले हैं।

कांग्रेस विधायकों ने बतौर पसीसी चीफ सुक्खू की कारगुजारी पर भी सवाल खड़े किए और कहा कि उनकी जगह नये अध्यक्ष को बनाने का राहुल गांधी का निर्णय काबिलेतारीफ है।

इन विधायकों ने कहा कि पिछले विधान सभा चुनाव में सुक्खू ने पार्टी अध्यक्ष होने के नाते जिन-जिन नेताओं को कांग्रेस टिकट दिये उनमें ज्यादातर नेता अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। उन्होंने कहा कि सुक्खू के वीरभद्र सिंह के खिलाफ आ रहे बयान सारी सीमायें लांघने वाले हैं। अब उनके पास इस तरह की आधारहीन बयानबाजी करने का अधिकार ही नहीं रह गया क्योंकि वह अब एक कांग्रेस के आम कार्यकर्ता हैं अध्यक्ष नहीं।

कांग्रेस के 11 विधायकों ने कहा कि सुक्खू का यह बयान कि पिछले विधान सभा चुनाव में हार की जिम्मेवारी सरकार की है, संगठन की नहीं, हास्यस्पद और बचकाना है, क्योेंकि पार्टी अध्यक्ष होने के नाते यह दायित्व पार्टी का था और अपनी नैतिक जिम्मेवारी को दूसरे पर डालना किसी भी तरह उचित नहीं हैं।

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