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खेत-खलिहान

यहां जीरो बजट में पारंपरिक तरीके से होती है लाल चावल की खेती

रवि प्रकाश : बैजनाथ (कांगड़ा) | October 28, 2018 08:17 AM

हिमाचल न्यूज़

बैजनाथ (कांगड़ा) : हिमाचल की दुर्गम चौहार घाटी मे आज भी प्राकृतिक रूप से परंपरागत तरीके से लाल चावल उगाया जाता है। आज के युग में केमीकल खेती ने जहां खाद्य पदार्थों की गुणवता पर सवालिया चिन्ह लगा दिए हैं वहीं प्रदेश में आज भी कुछ दुर्गम क्षेत्रों में परंपरागत खाद्यों पदार्थों की खेती की जा रही है। इसी में शामिल है चौहार घाटी के चौहारटु चावल जो अपने लाल रंग व अपनी औषधीय गुणवत्ता के कारण विशेष महत्व रखते हैं। हरित क्रांति के दौर में अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों की ओर किसानों के रूझान से दूर चौहार घाटी के किसान आज भी लगभग एक हजार हैक्टेयर में लाल चावलों की चौहारटी किस्म उगा रहे हैं। पब्बर नदी के दोनों तटों पर उगाए जाने वाले चावलों की यह किस्म प्रदेश के अन्य चावलों से पूर्णतय भिन्न है।

जन्म से मरण तक लाल चावल का प्रयोग
सदियो से चली आ रही लोक परंपरा के चलते लाल चावल चौहार घाटी के लोगों के जीवन का अंग बन चुका है। जन्म से लेकर मरण तक अपने परंपरागत अनुष्ठानों में इन चावलों का प्रयोग चौहारवासी करते हैं। लाल चावल के बिना चौहार घाट के लोगों का कोई भी अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता। विवाह समारोह, मुंडन संस्कार या अन्य कोई भी शुभ कार्य हो लाल चावल को हर रस्म और भोज में शामिल किया जाता है। यही नहीं, अंतिम क्रिया की रस्म अदायगी में भी लाल चावल का उपयोग होता है।

ये है खासियत
चौहार घाटी के लाल चावलो की खास बात यह है कि इसमें रैड परिकारप पाए जाते है, जो शरीर में लोह अयस्कों की पूर्ति करते है। इस चावल के पानी को गर्भवती महिलाओं व बच्चों के लिए अच्छा आहार माना जाता है।

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