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विचार

हिमाचली हकों पर डाका

October 30, 2018 07:23 AM

हिमाचल न्यूज़

हिमाचल में निर्माणाधीन और निर्मित परियोजनाएं जो बनकर तैयार भी हो चुकी हैं, अथवा जिनमें उत्पादन भी बरसों से प्रारंभ हो चुका है, वे चाहे केंद्रीय विद्युत उत्पादन निगम के अधीन थीं या फिर किसी गैर सरकारी कंपनी के अधीन बनीं अथवा स्वंय विद्युत विभाग ने अपने नाम से बनवाईं। इन परियोजनाओं के निर्माण कार्यों में हिमाचली लोगों को रोजगार नहीं मिल पाया है। इसका मुख्य कारण निगम व कंपनी के साथ जो अनुबंध शर्तों पर हस्ताक्षर हुए थे, उनमें हिमाचली मजदूरों व हिमाचली बेरोजगार इंजीनियरों, प्रारूपकारों व अन्य व्यवसायिक, तकनीकी डिप्लोमा या डिग्री होल्डरों का जिक्र तक नहीं था, चाहे अनुबंध हस्ताक्षर कांग्रेस शासनकाल में हुए थे या भाजपा के राज में हुए हों। ये गलतियां प्रदेश सरकार ने भाखड़ा व्यास परियोजनाओं के शर्तनामे से लेकर की हैं। अत: पंजाब के विभाजन के समय जब तीन हिस्सों में पुनर्गठन किया गया, तो हिमाचल के लिए सभी मदों में केवल 7.19 प्रतिशत हिस्सा ही रखा गया, शेष पंजाब-हरियाणा ने परस्पर मिल बांटकर ले लिया। पुनर्गठन के बाद भी हमारी छाती पर बैठकर मूंग दलने की नीति हमारे साथ अपनाई गई। जबकि धरती भी हमारी, पानी भी हमारा, बिजली भी हमारी, लेकिन नाम भी पंजाब का, काम भी पंजाब का, जबकि इस वक्त जो शर्तनामे में शर्तें अनुबंधित हैं इनके मुताबिक पंजाब कहीं भी नहीं टिकता है। 1996-97 से पूरी तरह शानन परियोजना हिमाचल की है। वह हिमाचल को मिलनी जरूरी है, जो प्रतिवर्ष 55 करोड़ की आय हिमाचल को देगी। क्या पंजाब नहीं मालूम कि इन परियोजनओ से विस्थापित व प्रभावित हिमाचल के लोग हुए हैं। भूमि व वन हमारे नष्ट हुए हैं, डूबे हैं। जिनका पुनर्वास अभी तक भी पूरा नहीं हो रहा है। वस्तुत: देखा जाए तो भाखड़ा-ब्यास, रणजीत सागर पर पूरा-पूरा अधिकार हिमाचलियों का होना चाहिए था, न्याय तो ऐसा ही कहता है। इन परियोजनाओं का जलग्रहण क्षेत्र हजारों वर्ग मील का रहा है। लगभग पौने एक करोड़ एकड़ भूमि पानी में डूब गई। हजारों लोग उजड़ गए। फिर अधिकार पंजाब का हो, ऐसा कैसे संभव समझा गया है। केवल भाखड़ा ब्यास से ही चौदह सौ मेगावाट बिजली का लाभ भाखड़ा-ब्यास मैनेजमेंट को वर्षों से मिल रहा है। हमारे लोग पंडोह, खयूरी, वरगी, सुंदरनगर, सलापड़, डैहर से लेकर भाखड़ा-नगंल तक बिलासपुर समेत पुनर्वास के चक्कर में अभी तक फंसे हैं। प्रश्र यही उठता है, आखिर हिमाचल को कब अपना हक मिलेगा?

आलम पोर्ले 

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