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साहित्य

पहाड़ की कंद्राओं में स्न्नोवा...

हिमाचल न्यूज़ : साहित्यक डेस्क | November 08, 2018 08:40 AM
प्रतीकात्मक चित्र

एक टीवी के कैमरे के सामने जब मैं बोल रहा था, स्नोवा ने रसोई में हम सबके लिए एक बार चाय और दूसरी बार कॉफी बनाई और चुपके से मुझे परदे के पीछे से थमाई. यही नहीं, रहस्यमयी ने हमारी सारी बातें सुनीं. वे संयोग से मनाली में ही थी. मेरे बुलाने पर कुछ देर के लिए आई और चली गईं. गहरी शरारत और रहस्य के सजग खेल हमारा प्यारा धंधा है, जिन्हें अपना सिर फोडऩा है, फोड़ लें....रहस्यमयी लेखिका स्नोवा बार्नो के संदर्भ में बेबाक कहानीकार सैन्नी अशेष

साहित्य जगत व समाचार पत्रों में स्नोवा बार्नो को लेकर मचा बवाल, रहस्य के आवरण में ढकी स्नोवा को टटोलने की कोशिश व उनके तिलिस्म को भेदने के लिए सवालों का झुरमुट लिए स्नोवा के करीबी मित्र होने का दावा करने वाले कहानीकार सैन्नी अशेष से हिमाचल न्यूज़ की सीधी बात.

हिमाचल न्यूज़ : सैन्नी अशेष को बचपन से चंपक व अन्य बाल पत्रिकाओं में पढ़ा, उसके बाद गंभीर साहित्य में भी आप नजर आए. अब आपके साथ साहित्यिक सफर में एक ऐसा नाम जुड़ गया जिसके होने न होने को लेकर संकट है, आखिर स्नोवा कौन है?
अशेष : बरसों पहले शुभ तारिका के एक नियमित स्तंभ में एक अजनबी लड़की के परिचय के साथ मेरा फोटो छपा. फिर वही फोटो ओशो टाइम्स इंटरनेशनल में मिस्टिक हिमालय के एक विज्ञापन में इन पंक्तियों के साथ प्रकाशित हुआ था. क्या आप खूबसूरत और खतरनाक हैं? हिमालय के एक सन्नाटे को आपका इंतजार है. तब किसी ने उस लड़की की तरफ ध्यान नहीं दिया था, न ही कोई सवाल पूछा था लेकिन आज हर कोई उस लड़की से मिलना चाहता है. वह लड़की और कोई नहीं, आज हिन्दी व मीडिया जगत में सर्वाधिक चर्चित कर दी गई और कुछ रहस्यमयी बना दी गई कथाकार एवं कवियत्री स्नोवा बार्नो है, जिसके कथ्य को समझे बिना कुछ स्थानीय लोगों ने विपरीत छोर पर जाकर जल्दबाजी में कह दिया कि कहानियों में कुछ नहीं है बस विदेशी होने के नाते ही चर्चित है.

हिमाचल न्यूज़ : फिर चर्चाओं की आखिर वजह क्या है?
अशेष : सच यह है कि उन कहानियों की मार्मिकता और गहनता पर रोज सुधी समीक्षक व पाठक टिप्पणियां कर रहे हैं. खुली समझ की महिला पाठकों ने एक रहस्यमयी कथाकार को पलकों पर बिठा कर रख लिया है. पाठकों ने इन कहानियों को अद्भुत रूप से चकित करने वाली रचनाएं, हिन्दी के सारे मिथ्य ढहाने वाला जलजला, हिन्दी जगत में नए युग का सूत्रपात,ताजमहल से भी सुंदर, मृत्यु व प्यार का महागान, ध्यान की दिव्य स्थितियों में सृजित कहानियां बताया है. अतिश्योक्तियों के बीच संतुलित टिप्पणियां निरंतर आ रही है. अध्येताओं के अनुसार ये कहानियां भविष्य में नए—नए अर्थ खोलेंगी.

हिमाचल न्यूज़ : वयोवृद्ध संपादक एवं वरिष्ठ लेखक राजेंद्र यादव स्नोवा की लेखकीय प्रतिभा से खासे चकित लग रहें हैं, महिला लेखकों में अकसर चर्चित श्री यादव का यह कोई नया पैंतरा तो नहीं?
अशेष: कहानियों से चकित होने वाले सिर्फ राजेंद्र यादव ही नहीं, डा. नामवर सिंह, डा. सूरज पालीवाल, आलोक श्रीवास्तव, मुशरर्फ आलम जौकी, डा. परमानंद श्रीवास्तव सहित देशभर के सुरुचि संपन्न पाठक शामिल हैं. साथ ही अर्चना त्रिपाठी, रजनी गुप्त, संध्या मिश्र, बीना सिंह, अनिता रश्मि, मधुर कुलश्रेष्ठ जैसे कितने ही समीक्षक व लेखिकाएं सम्मिलित हैं.

हिमाचल न्यूज़ : कुछ ने यह भी कहा कि स्नोवा रचित साहित्य से लेखकीय ईमानदारी के बिगडऩे का खतरा है, आप की राय?
अशेष : उच्चकोटि का साहित्य प्रकाशित करने वाली किसी भी पत्रिका ने इन कहानियों पर उंगली नहीं उठाई है. बस, लेखन व लेखिका के रहस्य पर स्तब्ध एवं रोमांचित हैं. साहित्य व कला के इतिहास में मिस्टिक लेखन की घटना नई नहीं है, लेकिन जो नहीं जानते, उनके लिए तो बहुत अनोखी है. सिर्फ सनसनी में व्यस्त स्थानीय ईष्र्या को छोड़ कर अन्यत्र कहीं भी इन कहानियों से ध्यान नहीं हटाया गया. वर्तमान साहित्यक पत्रिका ने तो बहुत सजगता और लगाव से एक लंबा लेख प्रकाशित किया. हंस में कई लेख आए. कौसानी, लखनऊ, ग्वालियर और रायपुर जैसे शहरों से कितनी ही साहित्यिक संस्थाओं ने इन कहानियों पर संवाद किए. यहां तक कि स्नोवा के प्रथम यात्रा—संस्मरण को कोलकाता की भारतीय भाषा परिषद ने प्रथम पुरस्कार भी दिया. शिमला में कथित जले—भुने हुए लोगों तक को उनसे मिलने की इच्छा में पुरस्कार घोषित करना पड़ा.

हिमाचल न्यूज़ : संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि स्नोवा के घूंघट में कहीं सैन्नी अशेष ही या कोई और पुरुष साहित्यकार यह सब रच रहा हो? क्या सभी पत्र—पत्रिकाओं की टिप्पणियों से आप रू—ब—रू हैं?
अशेष : हंस, पहल, वागर्थ, नया ज्ञानोदय,इंडिया टुडे, इंडिया न्यूज, सरिता, आउट लुक, कथाक्रम, पाखी, वसुधा, विपाशा, इरावती, शेष, पर्वत राग आदि पंद्रह—बीस पत्रिकाओं में एक साल के भीतर स्नोवा की बीस कहानियां, बीस कविताएं, कुछ उपन्यास अंश और वागर्थ में प्रथम पुरस्कार पाने वाले संस्मरण का स्वीकृत व प्रकाशित हो जाना, फिर वर्तमान साहित्य, परिकथा, लमही, कथादेश, जनसत्ता, भास्कर और अमर उजाला समेत कितनी ही पत्र—पत्रिकाओं में उसके कथ्य, भाषा और रहस्य पर लगातार टिप्पणियां आना हिन्दी जगत में करिश्माई और सनसनीखेज घटना माना जा रहा है. पूरे घटनाक्रम को सैन्नी अशेष रचित एक नाट्य की संज्ञा तक दे डाली. नामी पत्रिका आऊटलुक ने स्नोवा की कहानी इश्क बंजारन प्रकाशित कर यह संदेह भी जता दिया कि स्नोवा के आवरण में किसी भारतीय पुरुष ने नामचीन संपादकों को ठग दिया.

हिमाचल न्यूज़ : क्या स्नोवा जैसी किसी कहानीकार को लेकर इस तरह का हल्ला वाजिब है? कहीं यह सब प्रचारात्मक लाभ लेने के मकसद से तो नहीं किया जा रहा है?
अशेष: मैं मानता हूं कि स्नोवा एक करिश्मा है लेकिन उसके संबंध में पगलाई सनसनी और लेखकीय जलन को लेकर मेरी उच्च पर्वतीय समझ में कुछ नहीं आया. मेरी समझ में आज तक यह भी नहीं आया कि हिन्दी जगत ने ओशो, जे. कृष्णमूर्ति व रावी को उनके जाने के बाद भी क्यों नहीं समझना चाहा? या गाली देंगे या चुप रहेंगे. अपने—अपने कुनबे में पारस्परिक चाटुकारिता और दूसरे कुनबे से लड़ाई जरूर चलाएंगे. बात सिर्फ इतनी है कि स्नोवा ने लिखा, संपादकों को अच्छा लगा तो उन्होंने छाप दिया. पढऩे वालों को और अच्छा लगा तो उन्होंने पढ़ लिया. ऊपर से वह विदेशी दिखाई देने वाली सुंदर गोरी छोरी तो है ही! प्रतिभा से संपन्न युवा स्त्री का आकर्षण सोने पर सुहागा क्यों न हो? इसमें क्या अनोखा या गलत है? फिर वह तो अपनी पूर्वघोषित अवधि यानि एक साल के लिए हिन्दी की दुनिया में आई और गई.

हिमाचल न्यूज़ :आखिर स्नोवा की पर्दादारी का राज क्या है? सुना है हिमाचल के ही कुछ लेखकों ने सूचना के अधिकार के तहत स्नोवा के बारे में जानकारी मांगी, विस्तार से जानना चाहता हूं.
अशेष : दो—चार शातिरों के उधार के सम्मान को हिन्दी में स्नोवा के प्रवेश के साथ ही चोट लग गई थी व उसकी अगली कहानी तक वे बेतरह छटपटाने लग गए. एक बयान बहादुर लेखक और एक रूढि़वादी संगठन की एक स्त्री ने इसे साहित्य व हिमाचल प्रदेश की सुरक्षा के लिए आतंक व कलंक घोषित कर दिया. अखबारों में बयान दे—देकर हिमाचल सरकार से कहा कि यह प्रदेश की सुरक्षा का मामला है और ऐलान किया कि स्नोवा चाहे दुनिया के किसी कोने में छिपी हों, उन्हें या तो सरकार ढंूढे या वे खुद ढूंढ निकालेंगे. जिन दिनों स्नोवा मेरे साथ मनाली में थीं, यह लोग उनकी खोज में आस्ट्रेलिया जाने की घोषणा कर रहे थे. यह सब अखबारों में छपता रहा और संवेदनशील साहित्यकार हमसे पूछते रहे कि हम क्यों इस गुंडागर्दी का जवाब नहीं देते? अक्सर मैं सोच में पड़ जाता हूं कि जागूं या पड़ा रहूं? मेरी युवा शक्ल अपनी जगह, पचास पार की उम्र का तकाजा अपनी जगह. गंभीर होते हुए ...स्नोवा के स्वागत व खूबसूरत रहस्य से रोमांचित होने की जगह इसे आतंक व कलंक का नाम तो कोई परले सिरे का घामड़ ही दे सकता है. ऐसा व्यक्ति यदि लेखक भी हो तो उसके लेखन को चमकाने वाले लोग कोई और ही हैं, वरना आतंकित होकर मेरे व स्नोवा के खिलाफ असाहित्यिक आंदोलन न छेड़ देते. सूचना पाने के हक की गैरकानूनी परिभाषा बनाकर कुछ लोगों ने प्रशासन को पीछे लगाया कि स्नोवा के जन्म से लेकर अब तक के सारे प्रमाण देकर बताएं कि वे कहां है? शिमला से आए आदेशों के दबाव में जब तक पुलिस सूचना पाने के अधिकार को जीवन, गोपनीयता व अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकारों से बड़ा मानती रही तब तक व्यर्थ में भटकती रही. हमारी संस्था से जुड़ी लड़की ने तंग आकर पूछा, जिस तरह से ये लोग हमसे सबूत मांग रहे हैं, क्या हम भी इनसे पूछें कि तुम्हारे पास क्या सबूत है कि तुम सही व्यक्ति की ही औलाद या मौलिक रचना हो? अडिगता व मौन बेपरवाही के कारण जब स्नोवा किसी के हाथ नहीं आई तो शोर मचा कि सैन्नी अशेष ने किसी राह चलती विदेशी लड़की का फोटो खींचकर कहानियों के साथ छपवाया है.

हिमाचल न्यूज़ : आरोप लग रहे हैं कि स्नोवा की फोटो मनघडं़त है, यह किसी विदेशी पर्यटक की बताई जा रही है, अगर स्नोवा है तो आपका उनसे रिश्ता व मिलना कैसे संभव है?
अशेष: आरोप लगाने वालों को विभिन्न संपादकों से पता चल गया कि मेरे साथ स्नोवा के कितने ही फोटो बरसों से उनके पास है. अब इन लोगों को एक और मुश्किल हो गई कि कहीं इन बहुप्रशंसित कहानियों का एकमात्र लेखक सैन्नी अशेष ही साबित न हो जाए. यह स्पष्ट है कि स्नोवा अगर है तो उनसे मिलने का रास्ता मेरे दिल के उन जख्मों से होकर जाता है, जिन्हें मैं हंस कर रोज सीता हूं. साहित्य के कथित शातिरों ने महीनों शिमला से अखबारों में हुड़दंग मचवाया कि, स्नोवा बार्नो सामने आओ, बात तो तुमको करनी होगी, वरना लेखनी छोडऩी होगी.

काम जितना शानदार है, रहस्य का नकाब उतना ही खूबसूरत है. रहस्य बना रहे तो बुरा क्या है? सृष्टि हो या सृजन, हर रचयिता को अपने ही ढंग का घूंघट चाहिए।

 हिमाचल न्यूज़ : रहस्य का यह आवरण कब उठेगा ?
अशेष : स्नोवा जब तक स्वयं लोगों के सही या मूर्ख सवालों के सच्चे या झूठे जवाब देने के लिए नहीं आना चाहेगी, तब तक मैं जो भी कहूंगा, उसे सच या झूठ मान लेने से कुछ हाथ नहीं आएगा. मुझे तो अपना भी पता नहीं कि मैं लेखक भी हूं कि नहीं? इस अहंकार में रखा भी क्या है? देश भर से लोग लगातार मुझसे उनके संबंध में पूछ रहे हैं. छाई वो है और शानदार शामत मेरी आई है.

हिमाचल न्यूज़ : : आखिरी बार स्नोवा और आप कब साथ थे?
अशेष : हाल ही में स्टार टीवी के कैमरे के सामने जब मैं बोल रहा था, स्नोवा ने रसोई में हम सबके लिए एक बार चाय और दूसरी बार कॉफी बनाई और चुपके से मुझे परदे के पीछे से थमाई. यही नहीं, रहस्यमयी ने हमारी सारी बातें सुनीं. वे संयोग से मनाली में ही थी. मेरे बुलाने पर कुछ देर के लिए आई और चली गई. गहरी शरारत और रहस्य के सजग खेल हमारा प्यारा धंधा है, जिन्हें अपना सिर फोडऩा है, फोड़ लें.

हिमाचल न्यूज़ : तो क्या स्नोवा विदेशी नहीं भारतीय लेखिका है और छद्म नाम से लेखन का क्या रहस्य है?
अशेष : स्नोवा शत—प्रतिशत भारतीय है. उन्होंने सिर्फ अपना नाम बदला है, फोटो नहीं. स्नोवा के छुटपन से लेकर अब तक के फोटो हैं. उनके पूर्वज भी प्रीति जिंटा के पूर्वजों की तरह विदेशी थे. स्नोवा गर्मियों में हिमालय व सर्दियों में समुद्रतटों के एकांतों में अधिक रहती हैं. मनाली से वे तभी गुजरती है, जब इस रास्ते लद्दाख आना—जाना होता है. जब भी उन तक गलत किस्म के सवाल पहुंचते हैं और उनके लेखन से इतर और अभद्र बातें होती हैं, वे मुझसे अपने बारे में थोक में झूठ बुलवाती हैं. वैसे मेरे भेस में कोई और है तथा होंठ मांगे बांसुरी कहानियों में स्नोवा ने अपनी और मेरी काफी पोल खोल दी है.

हिमाचल न्यूज़ : आपको स्नोवा का सह लेखक और उनका भाषा गुरु भी कहा जाता है, इतनी चर्चा के बाद आप स्वयं को कहां पाते हैं?
अशेष : वे जब कभी भी सामने आएगी, किसी भी अवांछित सवाल पर उनका पहला ऐलान होगा, ...मैं किसी सैन्नी अशेष को नहीं जानती... ...उनका कोई दीन—धर्म नहीं है ...जैसे सवाल, वैसे जवाब. वह भी अपरिहार्य हो तो.

हिमाचल न्यूज़ : स्नोवा की बारदो, मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता है.. और हमन है इश्क मस्ताना जैसी हिन्दी की कहानियों में क्या आपका भी रचनात्मक सहयोग है?
अशेष : लेखन क्षेत्र में स्नोवा से टैलीपैथिक संबंध है, जिसके लिए गहरी अभिन्नता को पहले साध लेना होता है, वरना असली कहानीकार होने के दावे उठ खड़े होंगे. दावे करने वाले मिलकर कुछ लिख ही नहीं सकते. बाहरी व्यक्तित्वों का विसर्जन चाहिए. कोई अगर मान ले कि सिर्फ स्नोवा है, मैं नहीं हूं या स्नोवा तो है ही नहीं, मैं ही मैं हूं, तो हमें अच्छा लगेगा. हम इसका सबूत नहीं मांगेंगे. पता नहीं यह घपला हैं कि चमत्कार? साहित्य के नेताओं से पूछना पड़ेगा कि जब दो जन एक मन हो जाएं तो सबूत को चाटें या चबाएं?

हिमाचल न्यूज़ : स्नोवा की अगली कहानियों के बारे में कुछ बताएं, क्या आपका उनके साथ सहलेखन जारी रहेगा?
अशेष : स्नोवा मेरी ही तरह मिस्टिक हिमालय की मस्त वालंटियर है. उन्हें सिर्फ 2008 के साल में हिन्दी साहित्य को कुछ कहानियां देनी थी. उनका मूल काम साहित्य से आगे के एक गहरे जगत में है लेकिन जो रचनाएं उन्होंने 2008 में हिन्दी के संपादकों को भेजी थी, उनमें से असली कहानियां अब नजर आनी शुरू होंगी. हम दोनों ने देह गगन के सात समंदर उपन्यास भी पिछले वर्ष ही लिखा, जिसके अंश कई पत्रिकाओं में आ चुके हैं. यह तन और मन का भयंकर और प्रलयंकर उपन्यास है. प्रेम का एटम बम, जो लोग हमें डरा चुके, वह बचें. साथ ही हिन्दी जगत में लिखने के लिए अब स्नोवा बार्नो का स्थान मिस्टिक हिमालय के दो नए वालंटियर संभाल चुके हैं. काम जितना शानदार है, रहस्य का नकाब उतना ही खूबसूरत है. रहस्य बना रहे तो बुरा क्या है? सृष्टि हो या सृजन, हर रचयिता को अपने ही ढंग का घूंघट चाहिए।

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