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इन्होंने की पहल और अब गिनीज़ बुक में है दर्ज़ है कुल्लुवी नाटी

आलम पोर्ले | November 10, 2018 08:49 AM
शेर ए कुल्लू : लाल चंद प्रार्थी

कुल्लू की नाटी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर चुकी है और इसका नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज़ हो चुका है. यह सब यूं ही नहीं हुआ. एक शख्सियत ने इसके लिए पच्चास के दशक में पहल की... अभियान छेड़ा.. और अब यह नाटी हर मेले, उत्सव व समारोह का अटूट हिस्सा बन चुकी है.

सच्चाई यह है कि प्रार्थी जी मंच पर उस समय नाचे जब कुल्लू क्षेत्र की पारंपारिक नृत्य कला समाप्त होने को थी.

इसकी पहल 1951 में शेर-ए-कुल्लू, चाँद कुल्लुवी, हिमाचल का मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम से अलंकृत स्व. लाल चंद प्रार्थी ने की. उस समय बहू-बेटियों का मंच पर नृत्य करना संस्कारों और संस्कृति के विपरीत माना जाता था. लेकिन लाल चंद प्रार्थी का प्रण था कि घाटी के पुरुषों और महिलाओं को एक लड़ी में जोड़कर कुल्लुवी लोकनृत्य को आधुनिक रूप देना. धारा के विपरीत की इस पहल पर जब उनका साथ किसी नहीं दिया तो लोगों के विरोध के बावजूद भी अपने घरों के सदस्यो को लेकर उन्होने एक दल गठित किया और उसे स्वयं नाचने-गाने का प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण देकर प्रेरित किया. इसी नर्तक दल ने 1952 में गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय पर्व पर पहली बार दिल्ली जैसे महानगर में लोक नृत्य का न केवल प्रदर्शन किया अपितु पुरस्कार भी हासिल किया

इस लोक नृत्य की प्रस्तुति ने समूची कुल्लू घाटी में जादूई प्रभाव छोड़ा. उस दौर में प्रार्थी के विरोधियों ने भी नर्तक दलों का गठन कर सांस्कृतिक जागरण में योगदान दिया.

नाटी डालते हुए लाल चंद प्रार्थी : दुर्लभ फोटो
 सच्चाई यह है कि प्रार्थी जी मंच पर उस समय नाचे जब कुल्लू क्षेत्र की पारंपारिक नृत्य कला समाप्त होने को थी. लोक-नर्तकों में हीन भावना फैल रही थी, पारंपरिक नर्तकों की कमी हो गई थी. इस प्रकार उन्होंने भूलते बिसरते लोक-नृत्य को पहचान देकर प्रतिष्ठा के स्थान पर ला खड़ा कर दिया.

फलत: दशकों से मौन खड़ी घाटी पुन: थिरकती, लोकगीतों की मस्ती में झूमती-नाचती, गाती, मुस्कराने लगी. वे इस उपलब्धि पर खुले मंच से जोरदार शब्दों में कहा करते थे- इस परंपरा को जीवंत बनाने के लिए हमने बहू-बेटियों को मंच पर नचाया है.
उनके इस प्रयास से दम तोड़ती सांस्कृतिक परंपरा जहां एक बार फिर जीवंत हो उठी वहीं कुल्लुवी नाटी को विश्वव्यापी पहचान भी मिली. यह सब प्रार्थी की संस्कृति के संरक्षण और पहचान दिलाने की दिशा में एक सार्थक पहल थी.

उन्होंने हिमाचल के पारंपरिक मेलों की सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत बनाया. वे बार-बार यह कहा करते थे कि- जो संस्कृति व साहित्य के महत्व नहीं जानते, उस देश की संस्कृति मर जाती है। वह राष्ट्र कभी जीवित नहीं रह सकता.

आलम पोर्ले 

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