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राजनीति

क्या गुल खिलाएगी राजा की ललकार

विमल शर्मा | November 28, 2018 12:33 PM
वीरभद्र सिंह : फाइल फोटो

शिमला : हिमाचली सियासत के शहंशाह वीरभद्र सिंह की नीति को क्या कांग्रेस झेल पाएगी? सियासी गलियारों में यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है। इस नीति पर मंथन को लेकर हिमाचल कांग्रेस के दिग्गज नेता और भावी नेता उलझ गए हैं। सियासी हलकों में चर्चा है कि क्या वीरभद्र सिंह की दबाव वाली राजनीति कांग्रेस हाईकमान के सामने एक बार फिर से चुनौती बन कर रहेगी या फिर अब कांग्रेस आलाकमान इस चुनौती को दरकिनार कर नए प्रयोग करते हुए नए समीकरण को जन्म देंगे।

हिमाचल कांग्रेस वर्तमान दौर में नेताओं की अस्तित्व का अखाड़ा बन कर रह गई है। हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का सार्वजनिक तौर पर पार्टी लीक से हटकर या घोषणा कर देना कि आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर कौन प्रत्याशी किस क्षेत्र से अपने दावेदारी पेश करेगा को लेकर ऐलान कर देना और एक अलग तरह से अपने सहयोगियों के साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू को बाहर का रास्ता दिखाने के साथ-साथ हिमाचल कांग्रेस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर देना, क्या संदेश देता है? यह भी अपने आप में कांग्रेसी नेताओं के लिए परेशानी पैदा करने वाला है।

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने जहां एक तरफ हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से विधायक राजेंद्र राणा के पुत्र अभिषेक राणा को टिकट देने की पैरवी की है वही कांगड़ा से पूर्व मंत्री व उनके दत्तक पुत्र के नाम से जाने वाले सुधीर शर्मा को चुनाव में उतारने का ऐलान भी किया है लेकिन खुद चुनाव लड़ने से इनकार करना कहीं ना कहीं संदेह पैदा करता है कि वीरभद्र सिंह आने वाले समय में राहुल कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती ना बन जाए।

हालात ये हैं कि वीरभद्र कांग्रेस बनाम राहुल गांधी कांग्रेस एक अस्तित्व की लड़ाई सार्वजनिक तौर पर सामने आ गई है। राहुल गांधी की पसंद कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू इस जंग के अहम मोहरे हैं जो पिछले करीब 6 सालों से पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को खटक रहे हैं। लेकिन, वीरभद्र सिंह सुक्खू को हटा नहीं पाए। इससे भी साफ संदेश जाता है कि आलाकमान अब वीरभद्र सिंह की दबाव की राजनीति को सहन करने की मूड में नहीं है। इस बात से वीरभद्र सिंह भी वाकिफ हैं और यह भी जानते हैं कि प्रदेश में उनके दखल के बिना कांग्रेस अस्तित्व में नहीं आ सकती।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन लोकसभा चुनावों में भले ही वीरभद्र सिंह के जनाधार को देखते हुए सीटें तो हासिल की जा सकती है लेकिन उनकी इस दबाव वाली राजनीति को देखते हुए क्या भविष्य में हिमाचल में कांग्रेस खुद अपना रास्ता तय कर पायेगी यह भी अपने आप में सवाल बना हुआ है। वीरभद्र सिंह इस दबाव की राजनीति के चलते प्रदेश में आने वाले विधानसभा चुनाव में अपने पुत्र को राजनीति में पूरी तरह से स्थापित करना चाहते हैं ताकि उनकी विरासत का सिक्का चलता रहे। जानकार मानते हैं कि प्रत्येक पिता अपने पुत्र के लिए ऐसा ही चाहता है। लेकिन, इसका नुकसान कांग्रेस पार्टी क्यों भुगते।

वहीं, भाजपा भी कांग्रेस के इस खेल को बड़ी नजदीक से देख रही है और आकलन कर रही है कि उनकी नैया कैसे पार लगेगी। कहा जा रहा है कि अगर कांग्रेस में आपसी गुटबंदी इसी तरह बढ़ती रही तो भाजपा के लिए आगामी लोकसभा चुनाव की राह आसन हो जाएगी।

भले ही कांग्रेस के दिग्गज नेता चाहे वह जीएस बाली हो या फिर ठाकुर कौल सिंह यह कह रहे हैं कि आगामी लोकसभा में किस नेता को टिकट मिलेगा यह तो आलाकमान ही तय करेगा। लेकिन, वीरभद्र सिंह की ताजा ललकार से तो यही लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी में पूरी तरह खलबली मच गई है। अगर वीरभद्र सिंह की इस ललकार को कांग्रेस हाईकमान गंभीरता से नहीं लेती तो इसमें नही कोई संशय नहीं है कि हिमाचल में वीरभद्र गुट अलग से लोकसभा चुनावों में अपने प्रतिनिधियों की पैरवी करेगा।

उधर, कांग्रेस के दूसरी श्रेणी के नेता मानते हैं कि वीरभद्र सिंह का दौर आखिरी पड़ाव पर है। इस आखिरी दौर में जीतने वाले उम्मीदवार इन से पल्ला झाड़ लेंगे।

हिमाचल में मौजूदा दौर में कांग्रेस की स्थिति उस डूबते जहाज की तरह है जहां से नेता छलांगे मार रहे हैं और अलग-अलग टापू बनाकर नया नगर बसाना चाहते हैं।

बहरहाल जो भी है यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि प्रदेश में राजा की ललकार क्या गुल खिलाती है और कांग्रेसी की दिशा व दशा क्या होगी।

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