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नहीं रहे मशहूर शायर राहत इंदौरी : जानिए उनके जीवन के अनछुए पहलू

हिमाचल न्यूज | August 11, 2020 08:32 PM
राहत इंदौरी

हिमाचल न्यूज : मशहूर शायर राहत इंदौरी ने दुनियां को अलविदा कह दिया है। कोरोना से संक्रमित से जूझ रहे राहत इंदौरी का इंदौर के अरविंदो अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया है। वे 70 साल के थे।

अरविंदो अस्पताल के डायरेक्टर विनोद भंडारी ने जानकारी देते हुए बताया कि उन्हें कई प्रकार की दिक्कते इलाज के दौरान सामने आई, जिसमें पायलेटर निमोनिया, 70 प्रतिशत लंग खराब, कोविड पॉजिटिव, हाईपर टेंशन, डायबिटिक शामिल हैं। वे परसो रात को किसी निजी अस्पताल से आए थे और आज दिल का दौरा पड़ा और सिवियर अटैक आया और उसके बाद एक बार रिवाईव भी हुए पर अभी उनका देहांत हो गया।

खुद ट्वीट कर कोरोना पॉजिटिव होने की दी थी जानकारी
बता दें कि कोरोना पॉ़जिटिव पाए जाने के बाद मशहूर शायर राहत इंदौरी को देर रात इंदौर के अरविंदो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ये जानकारी उन्होंने खुद ट्वीट कर दी थी। उन्होंने लिखा था, 'कोविड के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर कल मेरा कोरोना टेस्ट किया गया, जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। ऑरविंदो हॉस्पिटल में एडमिट हूं, दुआ कीजिए जल्द से जल्द इस बीमारी को हरा दूं।'

जन्म एवं परिवार : राहत का जन्म इंदौर में 1 जनवरी 1950 में कपड़ा मिल के कर्मचारी रफ्तुल्लाह कुरैशी और मकबूल उन निशा बेगम के घर हुआ। वे उनकी चौथी संतान हैं। इनकी दो बड़ी बहनें थीं जिनके नाम तहज़ीब और तक़रीब थे। एक बड़े भाई अकील और फिर एक छोटे भाई आदिल हैं। राहत इंदौरी के बचपन का नाम कामिल था। बाद में इनका नाम बदलकर राहत उल्लाह कर दिया गया।

शिक्षा : उनकी प्रारंभिक शिक्षा नूतन स्कूल इंदौर में हुई। उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से 1973 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया। 1985 में मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य ने उन्हें उर्दू साहित्य में पीएचडी से नवाजा था। वह न सिर्फ पढ़ाई में प्रवीण थे बल्कि वो खेलकूद में भी प्रवीण थे,वे स्कूल और कॉलेज स्तर पर फुटबॉल और हॉकी टीम के कप्तान भी थे। वह केवल 19 वर्ष के थे जब उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में अपनी पहली शायरी सुनाई थी।

मुफलिसी में गुजरा बचपन
राहत इंदौरी के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी और उन्हें शुरुआती दिनों में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। उनके वालिद रिफअत उल्लाह 1942 में सोनकछ देवास जिले से इंदौर आए थे। इनके वालिद ने इंदौर आने के बाद ऑटो चलाया। मिल में काम किया, लेकिन उन दिनों आर्थिक मंदी का दौर चल रहा था। 1939 से 1945 तक दूसरे विश्वयुद्ध का भारत पर भी असर पड़ा। मिलें बंद हो गईं या वहां छंटनी करनी पड़ी। राहत साहब के वालिद की नौकरी भी चली गई। हालात इतने खराब हो गए कि राहत साहब के परिवार को बेघर होना पड़ गया था।

चित्रकार के रूप में शुरुआत
राहत इंदौरी ने अपने ही शहर में एक साइन-चित्रकार के रूप में 10 साल से भी कम उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। चित्रकारी उनकी रुचि के क्षेत्रों में से एक थी और बहुत जल्द ही बहुत नाम अर्जित किया था। वह कुछ ही समय में इंदौर के व्यस्ततम साइनबोर्ड चित्रकार बन गए। क्योंकि उनकी प्रतिभा, असाधारण डिज़ाइन कौशल, शानदार रंग भावना और कल्पना की है कि और इसलिए वह प्रसिद्ध भी हैं। यह भी एक दौर था कि ग्राहकों को राहत द्वारा चित्रित बोर्डों को पाने के लिए महीनों का इंतजार करना भी स्वीकार था। यहां की दुकानों के लिए किया गया पेंट कई साइनबोर्ड्स पर इंदौर में आज भी उनका नाम देखा जा सकता है।

आरंभिक दिन
राहत इंदौरी ने शुरुआती दौर में इंद्रकुमार कॉलेज, इंदौर में उर्दू साहित्य का अध्यापन कार्य शुरू कर दिया। वह कॉलेज के अच्छे व्याख्याता थे। फिर बीच में वो मुशायरों में व्यस्त हो गए और पूरे भारत से और विदेशों से निमंत्रण प्राप्त करना शुरू कर दिया। उनकी अनमोल क्षमता, कड़ी लगन और शब्दों की कला की एक विशिष्ट शैली थी, जिसने उन्हें बहुत जल्दी व बहुत अच्छी तरह से जनता के बीच लोकप्रिय बना दिया और लोगों के दिलों में अपने लिए एक खास जगह बना लिया। तीन से चार साल के भीतर ही उनकी कविता की खुशबू ने उन्हें उर्दू साहित्य की दुनिया में एक प्रसिद्ध शायर बना दिया था।

इंदौर से बहुत लगाव रखते थे
राहत इंदौरी ने कभी भी फिल्मी दुनिया में जमने और बसने के लिए जद्दोजहद नहीं की। मुशायरे के बाद अगर उनको किसी से सबसे ज्यादा लगाव था तो वो है उनका अपना शहर इंदौर।

फिल्मों में भी लिखे गीत
राहत इंदौरी ने मुन्ना भाई एमबीबीएस, मीनाक्षी, खुद्दार, नाराज, मर्डर, मिशन कश्मीर, करीब, बेगम जान, घातक, इश्क, जानम, सर, आशियां और मैं तेरा आशिक जैसी फिल्मों में गीत लिखे। महेश भट्ट की 'सर' उनकी पहली फिल्म थी। 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' जैसी फिल्म में हिट गाने लिखने वाले राहत इंदौरी को फिल्मी दुनिया कभी भी पूरी तरह से इस्तेमाल ही नहीं कर पाई। उनकी कुछ शुरुआती फिल्मों पर नाकामी का ठप्पा लगा था। जब वो डूबकर अपने शेर पढ़ते हैं तो हजारों लोगों का मजमा दीवाना-सा हो उठता था। जिन लोगों ने ये सब अपनी आंखों से देखा है, वो तो यही कहेंगे कि राहत की असल जगह फिल्मी संगीतकार का दरबार नहीं मुशायरे का मंच था।

अपने लिए लिखकर मुशायरे में अपने लिए शेर पढ़ना किसी भी शायर के लिए ज्यादा तसल्ली देने वाला होता है। फिर राहत ने तो मुशायरे में शेर पढ़ने की अपनी एक शैली विकसित की थी। जिसकी नकल जाने-अनजाने सैकड़ों शायर करते हैं। 

“शाखों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं है हम

आंधी से कोई कह दे के औकात में रहे”

अलविदा ! राहत इंदौरी साहब।

Posted By :Himachal News

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