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कविता

बेटी हूं हिन्दुस्तान की

कविता : टारना | July 01, 2021 06:47 PM
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बेटी हूं हिन्दुस्तान की, सब पर मैं भारी हूं।

भारतवर्ष है जान मेरी, समाज की जिम्मेदारी हूं॥

 

माता-पिता की लाडली मैं, भाई-बहन की दुलारी हूं।

ससुराल की शोभा मैं, मायके की फूलवारी हूं॥

 

जब-जब हुआ अपमान मेरा, जब-जब चिखी पुकारी हूं।

लिया अवतार दुर्गा का, मैं ही सिंह सवारी हूं॥

 

मत समझना कमजोर मुझे, कभी किसी से नहीं हारी हूं।

मैं ही इंदिरा, मैं ही सुनिता, मैं ही कल्पना प्यारी हूं॥

 

मुझे भी हक है जीने का, मैं एक भारतीय नारी हूं।

सिंहनी बनकर लक्ष्मीबाई मैं, दुश्मनों को चुनकर मारी हूं॥

 

क्यों बेटा-बेटा करते हो, मैं भी औलाद तुम्हारी हूं।

कभी बहू, कभी बेटी बनकर हर रिश्ते को संवारी हूं॥

 

कभी दहेज़ के लिए प्रताड़ित हुई, कभी आग लगाकर मारी हूं।

कभी आत्महत्या का रूप देकर ,मौत के घाट उतारी हूं॥

 

मुझ बिन हर घर सूना सूना,

ममता की मैं पिटारी हूं।

 

सच  इस जहां की तो मैं ही खुशियां सारी हूं॥

आज टूट गई मैं, बिखर गई मैं, सच में खुद से भी हारी हूं।

 

कभी निर्भया, तो कभी गुड़िया बनकर,

तड़पा-तड़पा कर मारी हूं॥

 

और अन्त में ये पंक्तियां उन दरिंदों के लिए......

मुझे यूं सताने वालों, जिंदा मुझे जलाने वालों,

क्या इतना भी ख्याल नहीं आया, हस्ती मेरी मिटाने वालों?

मैं भी तो किसी के अंगना की, एक प्यारी सी राजकुमारी हूं॥

 

टारना : कवियत्री
कविता : टारना, दुर्गानगर कुल्लू

Posted By : Himachal News

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