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देव परम्पराएं

हिडिम्बा के बिना कुल्लू दशहरे की कल्पना भी नहीं

आलम पोर्ले : कुल्लू | October 16, 2021 04:12 AM
फोटो - हिमाचल न्यूज़

हिमाचल न्यूज़ । कुल्लू दशहरा की देवी हिडिम्बा के बिना कल्पना भी नहीं की जा सकती। कहा जाता है कि देवी हिडि़म्बा ने ही कुल्लू के राजाओं को राज पाठ दिलाया था। शायद यही कारण है कि आज भी अन्तर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरे में देवी हिडि़म्बा का जाना लाज़मी माना जाता है। कहा जाता है कि जब तक देवी कुल्लू न पहुंचे, तब तक कुल्लू दशहरे को शुरू नहीं किया जा सकता।

राजघराने की दादी हैं देवी हिडिम्बा
कुल्लू घाटी की अधिष्ठात्री देवी हिडिम्बा को राज परिवार की दादी भी कहा जाता है। कहा जाता है कि विहंगमणि पाल को कुल्लू के शासक होने का वरदान हिडिंबा देवी ने ही दिया था। इसीलिए वह कुल्लू के पहले शासक विहंगमणि पाल की दादी और कुल की देवी भी कहलाती है। कुल्लू दशहरा देवी हडिम्बा के आगमन से शुरू होता है। पहले दिन देवी हडिम्बा का रथ कुल्लू के राजमहल में प्रवेश करता है और देवी हिडिम्बा की पूजा अर्चना के बाद भगवान रघुनाथ की पालकी को भी ढालपुर में लाया जाता है।  देवी हिडिम्बा पूरे दशहरा तक अपने अस्थायी शिविर में ही रहती हैं और लंका दहन के बाद ही अपने मूल स्थान मनाली लौटती हैं।

फोटो - हिमाचल न्यूज़
 

क्या है इसके पीछे की कहानी
कुल्लू के दशहरे का सीधा संबंध रामायण से नहीं जुड़ा है। बल्कि कहा जाता है कि इसकी कहानी एक राजा से जुड़ी है। सन् 1636 में जब जगतसिंह यहां का राजा था, तो मणिकर्ण की यात्रा के दौरान उसे ज्ञात हुआ कि एक गांव में एक ब्राह्मण के पास बहुत कीमती रत्न हैं। राजा ने उस रत्न को हासिल करने के लिए अपने सैनिकों को उस ब्राह्मण के पास भेजा। सैनिकों ने उसे यातनाएं दीं, डर के मारे उसने राजा को श्राप देकर परिवार समेत आत्महत्या कर ली।

कुछ दिन बाद राजा की तबीयत खराब होने लगी। तब एक साधु ने राजा को श्रापमुक्त होने के लिए रघुनाथजी की मूर्ति लगवाने की सलाह दी। अयोध्या से लाई गई इस मूर्ति के कारण राजा धीरे-धीरे ठीक होने लगा और तभी से उसने अपना जीवन और पूरा साम्राज्य भगवान रघुनाथ को समर्पित कर दिया। तभी से यहां दशहरा पूरी धूमधाम से मनाया जाने लगा।

 

हिडिंबा देवी की कहानी
हिडिम्बा पांडवों के दूसरे भाई भीम की पत्नी है। हिडिम्बा एक राक्षसी थी जो अपने भाई हिडिम्ब के साथ मनाली के ढूंगरी में रहती थी। उसने कसम खाई थी कि जो कोई उसके भाई हिडिम्ब को लड़ाई में हरा देगा, वह उसी के साथ अपना विवाह करेगी। उस दौरान जब पांडव निर्वासन में थे, तब पांडवों के दूसरे भाई भीम ने हिडिम्ब की यातनाओं और अत्याचारों से ग्रामीणों को बचाने के लिए उसे मार डाला और इस तरह महाबली भीम के साथ हिडिम्बा का विवाह हो गया। भगवान श्रीकृष्ण ने हिडिंबा देवी को लोगों के कल्याण के लिए प्रेरित किया था। भीम और हिडिम्बा का एक पुत्र घटोत्कच हुआ, जो कुरुक्षेत्र युद्ध में पांडवों के लिए लड़ते हुए मारा गया था।

फोटो - हिमाचल न्यूज़
 

कैसे बनी महाभारत की 'हडिंबा' मनाली की कुलदेवी
भीम से विवाह करने के बाद हिडिंबा राक्षसी नहीं रही। वह मानवी बन गई और कालांतर में मानवी से देवी बन गई। हिडिम्बा का मूल स्थान चाहे कोई भी रहा हो पर जिस स्थान पर उसका दैवीकरण हुआ है वह मनाली ही है। मनाली में देवी हिडिंबा का मंदिर बहुत भव्य और कला की दृषिट से बहुत उतकृष्ठ है। मंदिर के भीतर एक प्राकृतिक चटटान है जिसके नीचे देवी का स्थान माना जाता है। चटटान को स्थानीय बोली में 'ढूंग कहते हैं इसलिए देवी को 'ढूंगरी देवी कहा जाता है। देवी को ग्राम देवी के रूप में भी पूजा जाता है।

Posted By : Himachal News

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