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मनोरंजन

यशपाल शर्मा की जिद और जनून का नतीजा है फ़िल्म ‘पंडित लख्मीचंद’

पवन कुमार शर्मा | December 22, 2022 06:58 PM

हिमाचल न्यूज़ |  पांच साल हां पांच साल का जनून रात दिन एक ही नाम यशपाल के दिल और दिमाग मे पूरी तरह चढ़ा था। जब भी हम किसी भी फ़िल्म फेस्टिवल में ‘करीम मोहम्मद’ को लेकर जाते थे तो रात की महफिल का हीरो होते थे ‘पंडित लख्मीचंद’। दिल्ली, राज्यस्थान या शिमला के फ़िल्म फेस्टिवल में रात में ‘लख्मीचंद’ की गूंज सुनाई देती थी। यशपाल भाई पंडित जी की रागिनी जरूर सुनते थे।

इन्ही यात्राओं में एक दिन ‘करीम मोहम्मद’ के प्रोड्यूसर रविन्द्र रजावत फ़िल्म जूड़ने को तैयार हो गए बस फिर क्या था अर्जुन को कृष्ण जैसा सारथी मिल गया। रात दिन अपने जनून के साथ यशपाल स्क्रिप्ट पर राजू मान के साथ जूट गए। अब जिद थी कि जब तक स्क्रिप्ट up to mark न हो तब तक राइट और री राइट का सिलसिला चलता रहा।

फ़िल्म की कास्टिंग में भी एक जनून था। हरियाणा में जगह जगह यशपाल भाई अपनी टीम के साथ दिन रात घूमते रहे। गायक और नायक की खोज में। रुकने का नाम नही था बस तलाश थी कि बेहतर और बेहतर कलाकारों की।

अब बात आई संगीत निर्देश की तो सब से आगे नाम आया उत्तम सिंह जी का। उत्तम सिंह जी मुम्बई में रहते है और रविन्द्र जी का स्टूडियो है दिल्ली में तो तय ये हुआ कि उत्तम जी को अपनी टीम के साथ दिल्ली बुलाया गया और महीनों तक गानों की रिहर्सल और रिकॉर्डिंग चली। यशपाल भाई अपनी जिद और जनून की हद पार चुके थे गानों के अंतिम रूप तक लाने में।

कला निर्देशन के लिए आये जयंत देशमुख और फ़िल्म की लोकेशन और सेट निर्माण का कार्य यशपाल भाई की देखरेख में शरू हुआ। सेट पर एक एक बारीकी का ध्यान यशपाल की जिद के आगे फेल था। उन्हें जो चाहिए था उस समय को ध्यान में रख कर वैसे ही किया गया।

शूटिंग शुरू हुई लेकिन गर्मी तो 40 डिग्री को छू रही थी। लेकिन यशपाल अपने जनून और जिद को 100 लोगो की यूनिट में ट्रांसफर करने में कामयाब हुए। सब ऐसे काम कर रहे थे कि ये उन की पहली और आखिरी फ़िल्म हो। पहली इसलिए कि यशपाल के निर्देश के अनुसार काम up to mark होना चाहिए इसलिए बहुत सावधानी से बेस्ट काम करना है। और आखिरी इसलिए कि अपना बेस्ट से बेस्ट देना है जो भी अब तक सीखा है सब लगा देना है पता नही आगे ऐसा मौके मिले या न मिले। बस इसी जिद और जनून से फ़िल्म पूरी हुई।

फ़िल्म का सम्पादन का काम किया असीम सिन्हा जी ने जो अपने आप मे बहुत बड़ा नाम है।

और भी बहुत से टेक्नीशियन फ़िल्म से जूड़े। सब ने जी जान से मेहनत की कियोंकि फ़िल्म का अंजाम सब को पता था और वही हुआ।

फ़िल्म पंडित लख्मीचंद एक इतिहास बन गई। हरयाणा के सिनेमा को एक ऐसी ऊर्जा दे रही है जो सालों तक इसे शिखर पर रखेगा।

आज हरियाणा में ही नही पंजाब दिल्ली और मुम्बई में भी दर्शकों की भीड़ दर्ज कर रही है।

फ़िल्म एक श्रंद्धाजलि है लोक कलाकार पण्डित लख्मीचंद जी को। और हर कलाकार के जनून और जिद को।

यशपाल शर्मा को राष्ट्रीय पुरस्कार और अटल पुरस्कार की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं, आप ऐसे ही अपनी जिद और जनून को कायम रखते और फ़िल्म बनाये।

लेखक : पवन कुमार शर्मा (फ़िल्म निर्देशक)

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