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हिमाचल फिल्म पॉलिसी : हिमाचल के अनुभवी फिल्मकारों कि अनदेखी क्यों?

पवन कुमार शर्मा (फ़िल्म निर्देशक) | January 03, 2023 09:24 AM
पवन कुमार शर्मा – फ़िल्म निर्देशक

सभी प्रदेश का सिनेमा अपनी जड़ें मजबूत कर रहा है और सरकार किसी भी पार्टी की हो वो सब फ़िल्म नीति को मजबूत कर रही है। जैसे आज उत्तर प्रदेश में फ़िल्म बंधु 20 सालों से फिल्मों को प्रोत्साहित कर रही है उसी का नतीजा है कि आज 100 से अधिक फिल्मों की शूटिंग उत्तर प्रदेश में हमेशा चली रहती है। लखनऊ में तो फ़िल्म यूनिट अपनी शूटिंग की तारीख होटल के मिलने की तारीख के हिसाब से रखते है। कोई भी सरकार आए वो फ़िल्म बंधु की नीति को और बेहतर करने की कोशिश में कामयाब हो रही है और 10 या 20 करोड़ की सालाना सब्सिडी दे कर कई सौ करोड़ का व्यवसाय अपने प्रदेश में ला रही है।

अब तो मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मूकश्मीर, हरियाणा, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी फ़िल्म नीति को लेकर अपने-अपने राज्य में सब्सिडी के माध्यम से फ़िल्मकरों का स्वागत कर रहे हैं।

दूसरी तरफ, हिमाचल प्रदेश है...जहां पर फ़िल्म मेकर्स के लिए स्वर्ग है। शिमला, मनाली के अलावा  हिमाचल के अनगिनत छोटे-छोटे गांव व कस्बे अपनी प्राकृतिक सुंदरता से स्विजरलैंड को भी मात देते है। मैं मानता हूं कि मनाली, शिमला या धर्मशाला में अपार संख्या में सैलानी आते है, जिस से काफी हिमाचल के पर्यटन व्यवसाय से बड़ी आय हो रही है। लेकिन हिमाचल के वे खूबसूरत गांव जो सैलानियों की नजर ए इनायत से आज भी कोसों दूर है उस जगह को कोई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर ला सकता है तो वो सब से शक्तिशाली माध्यम है फ़िल्म। अगर हिमाचल के इन इलाके में फिल्मकारों को प्रोत्साहित किया जाता है तो वो जगह भी सैलानियों को अपनी तरफ लाने को आकर्षित करेगी।

अब बात आती है हिमाचली सिनेमा की जो अभी तक अपनी जड़ें तलाश रहा है। हिमाचल की एक भाषा नहीं है तो क्या हुआ बहुत से ऐसे राज्य है जिन की अपनी भाषा नहीं है। यानी अपनी कोई लिपि नही है जैसे हरियाणा, राज्यस्थान जैसे प्रदेश। लेकिन इन प्रदेशों के सिनेमा की अपनी पहचान है।

हिमाचल में बहुत सी बोलिया है। जो संस्कृत और हिंदी से मिलती है और सब को समझ भी आती है। जैसे कांगड़ी, मंडयाली आदि। फिर हिमाचली बोलियों में फिल्मे क्यों नही बनती। अब तक जिन्होंने भी प्रयास किए वो है संजीव रतन, अजय सकलानी और पवन कुमार शर्मा। लेकिन मैं अपना अनुभव आप सभी से सांझा करना चाहता हूं कि हिमाचली फ़िल्म बनाने से फ़िल्म के निर्माता को आर्थिक रूप से बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। सरकार का आर्थिक रूप से कोई एक पैसे का भी सहयोग नहीं। कोई भी डिस्ट्रीब्यूटर फ़िल्म को सिनेमा हाल में प्रस्तुत करने में पैसा लगाने को तैयार नही। फ़िल्म का सेटेलाइट, रिलीज़ आर्डर, पब्लिसिटी, और थिएटर का पैसा। ऐसे में कोई कैसे आगे प्रयास करेगा। सिर्फ संस्थाओं के नाम सिनेमा पर रख कर हिमाचली सिनेमा नही बनाया जा सकता।

मेरे विचार से किसी भी क्षेत्र का सिनेमा उस राज्य के प्रोत्साहन के बिना नहीं पनप सकता। हिमाचल प्रदेश में फ़िल्म नीति को कैबिनेट में पास किये चार साल हो गए लेकिन कोई कमेटी आज तक नहीं बनी। उसे लागू  नहीं किया जा सका। कारण कोई भी हो सब का हल होता है। नीति बनाने में जिन लोगों ने फिल्म्स हिमाचल में हिंदी या हिमाचली में बनाई है वो अब तक इस नीति का हिस्सा नहीं रहे। जब तक हिमाचल फ़िल्म नीति में हिमाचल के निर्माता, निर्देशक, कलाकार, संगीत निर्देशक का महत्व नहीं होगा तब तक उसे हिमाचल फ़िल्म नीति के नाम पर न ठगा जाए। किसी काम को करने के लिए, बनाने के लिए, उस काम के मास्टर की जरूरत होती है। जिस के पास उस विषय की पढ़ाई और अनुभव हो वे लोग ही उसकी नींव को मजबूत कर सकते हैं। बड़ी ईमारत बनाने के लिए एक इंजीनियर की जरूरत होती है, डॉक्टर की नहीं। फिर फ़िल्म बनाने या उस पर नीति बनाने में हिमाचल के उन अनुभवी फिल्मकारों कि अनदेखी क्यों। 

  

सरकार को ये भी लगता है कि प्रदेश के विकास के लिए बहुत से काम है। फ़िल्म, नाटक, नृत्य, चित्रकला का प्रदेश के विकास में क्या स्थान है। जबकि देश या प्रदेश की पहचान होती है वहां की कला एवं संस्कृति से होती है।  हिमाचल की कला और संस्कृति को यदि कोई अंतर्राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिला सकता है तो वो है हिमाचली सिनेमा, जिसकी कीमत अनमोल है।

राज्य के गांव - गांव में लोगो की आय में बहुत बड़ा हिस्सा बन सकता है सिनेमा। मुझे याद है कि जब भी हम हिमाचल के गांव  में शूटिंग करने जाते है तो लोग खुश हो जाते की छोटी से छोटी फ़िल्म वाला कम से कम 70 या 80 लाख तो उस गांव की मार्किट में खर्च करेगा। लोग खूब सहयोग करते है सब को महीने भर खूब काम मिल जाता है। होटल, मजदूर, दुकानदार, गाड़ी वाले सब जुट जाते है।

सरकार से मेरा मतलब प्रशासनिक अधिकारियों से भी है जो बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते है। कला-संस्कृति और सूचना से सम्बंधित जो भी अधिकारी है वो जरूर अपने विवेक से हिमाचल की कला संस्कृति पर कुछ ऐसे प्रेक्टिकल काम करे जिसे हिमाचल के लोग हमेशा याद रखे।

हिमाचल फ़िल्म नीति को व्यवहारिक रूप से चालू करें और राज्य की तरक्की के लिए सरकार आगे आ कर प्राथमिकता के आधार पर प्रदेश की कला एवं संस्कृति के सभी माध्यमो को प्रोत्साहित करें। कलाकारों की दुआओ में बहुत बल होता है।

 

पवन कुमार शर्मा – फ़िल्म निर्देशक
  पवन कुमार शर्मा – फ़िल्म निर्देशक

लेखक (हिमाचल से सम्बन्ध रखते हैं और इन्होने ब्रिना, करीम मुहम्मद, वन रक्षक जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है।)  

Posted By : Himachal News

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